भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र:इसके लिए घोषणा की आवश्यकता नहीं : कृष्णमोहन झा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने इस मंतव्य को बिना लाग-लपेट के दृढ़ता पूर्वक लगभग हर मंच से दोहराया है कि भारत से ही हिंदू राष्ट्र है। इसके लिए कोई घोषणा करने की आवश्यकता नहीं है। विगत दिनों एक कार्यक्रम में सूर्य का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह सूर्य पूर्व से ऊगता है इसके लिए किसी घोषणा की आवश्यकता नहीं होती उसी तरह यह घोषणा करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है। संघ प्रमुख ने कहा कि किसी देश की पहचान केवल वहां की शासन व्यवस्था से नहीं बल्कि वहां रहने वाले लोगों के आचरण, संस्कार और सामाजिक जिम्मेदारी से बनती है। व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण विषय पर केंद्रित अपने प्रेरक उद्बोधन में उन्होंने कहा कि राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी केवल शासकों की नहीं वहां रहने वाले नागरिकों पर भी है। संघ प्रमुख ने कहा कि भारत केवल एक भौगौलिक संरचना नहीं बल्कि सेवा,कर्म और समष्टि के कल्याण का स्वभाव है।सभी परमेश्वर के स्वरूप हैं अतः उपकार नहीं बल्कि सेवा हमारा धर्म है हमारी परंपरा में चैरिटी नहीं बल्कि सेवा की भावना निहित है और सेवा करना ही भारत का धर्म है। सेवा से मनुष्य की शुद्धि होती है और वास्तविक सुख बाहर नहीं अंदर होता है। मनुष्य देखकर सीखता है केवल सुनकर या बोलकर नहीं। खरगोन जिला मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर कसरावद क्षेत्र के लेपा गांव में निमाड़ अभ्युदय रूरल मैनेजमेंट एंड डेवलपमेंट एसोसिएशन तथा श्री रामकृष्ण विश्व सदभावना निकेतन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित एक कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने अपने अनुभव के आधार पर बताया कि माया का आधार आध्यात्म होना चाहिए। ईश्वर ने मनुष्य को संवेदना दी है। यही संवेदना हमें दूसरे के सुख दुख की अनुभूति कराती है। किसी की उपेक्षा कर सुख भोगना मनुष्य की संवेदना के विपरीत है। समाज और देश के दुःख को दूर करना मनुष्य का स्वभाव है और इसी भावना के आधार पर भारत ने दुनिया को धर्म का संदेश दिया। परतंत्रता काल में भी भारत का यह स्वभाव नहीं बदला।
संघ प्रमुख ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं बल्कि समाज और का दुःख दूर करने का स्वभाव विकसित करना होना चाहिए। टंट्या मामा और गाडगे जी महाराज ने कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली थी किंतु आज भी उनका सम्मान है। भागवत ने कहा कि हमारे अंदर दैवीय गुण निहित हैं। उन्हें बाहर निकालना होगा और उनका ज्ञान प्राप्त करना होगा।पहचान परिणाम की नहीं कर्म की मान्यता से होती है। संघ प्रमुख ने कहा कि भारत की उन्नति का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं बल्कि जल , जंगल, पर्वत,नदी,पशु, मानव , सभी की समग्र उन्नति है। इस कार्यक्रम में पूर्व लोकसभा स्पीकर श्रीमती सुमित्रा महाजन, भारती दीदी, पद्मश्री महेश शर्मा,दापे महाराज, मेवालाल पाटीदार, प्रांत प्रचारक राजमोहन, क्षेत्र प्रचारक स्वप्निल कुलकर्णी नर्मदा न्यास के अध्यक्ष नितिन कर्माकर रही। कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों की 250 विभूतियों को आमंत्रित किया गया था ।लेपा आश्रम की संस्थापिका भारती ठाकुर दीदी पहले रक्षा मंत्रालय में कार्यरत थीं। 2009 में नर्मदा परिक्रमा के दौरान एक बार जब वे अस्वस्थता वश लेपा गांव में रुकीं तो उन्होंने देखा कि वनवासी बच्चों की शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। इस स्थिति से द्रवित होकर उन्होंने लेपा गांव के बच्चों को शिक्षित करने का संकल्प ले लिया और रक्षा मंत्रालय की नौकरी छोड़ कर गांव में नर्मदालय आश्रम की नींव रखी। 14 बच्चों से शुरू हुई इस संस्था में आज 800 बच्चे शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। नर्मदालय आश्रम की संस्थापिका भारती ठाकुर दीदी को अब यहां प्रवृत्तिका विशुद्धानंद के नाम से जाना जाता है। संघ प्रमुख ने नर्मदालय आश्रम द्वारा वनवासी बच्चों को शिक्षित कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की भूरि भूरि प्रशंसा की।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)