ममतामयी माँ श्रीमती भागवती पाठक 
यशोवर्धन पाठक/
  क्या सीरत, क्या सूरत थी
         माँ ममता की मूरत थी
  पांव छुए और काम हुए, 
        अम्मा बस एक  महुरत थी 

पुण्यतिथि के अवसर पर सुप्रसिद्ध साहित्यकार, पत्रकार एवं शिक्षाविद स्व पं . भगवती प्रसाद जी पाठक की सहधर्मिणी एवं आदर्श अध्यापिका  स्व श्रीमती भागवती पाठक का संपूर्ण जीवन त्याग, तपस्या और संघर्ष की ऐसी कहानी है जो थोड़ी सी मुश्किल में भी घबराने वालों के लिए प्रेरणा का विषय बन सकती है। 30 मार्च 1925 को नगर के प्रतिष्ठित समाजसेवी स्व पं शंकर लाल पांडेय के घर जन्मी श्रीमती भागवती पाठक का शुभ विवाह जब उनकी ही नाम राशि श्री भगवती प्रसाद पाठक से हुआ तब वे मात्र चौथी कक्षा तक ही शिक्षा अर्जित कर पाई थी परन्तु शिक्षार्जान के प्रति अटूट लगन एवं पति की प्रेरणा  के बल पर उन्होंने एम ए तक की परीक्षाएं उत्तीर्ण कर सबको आश्चर्य चकित कर दिया। एम ए की परीक्षा के तत्काल बाद ही अगर पूज्य पिता का स्वर्गवास नहीं हुआ होता तो संभवतः माँ ने पी एच डी की उपाधि का लक्ष्य भी अर्जित भी कर लिया होता परन्तु पिता के असमय निधन से ऊन्होने शासकीय उ मा शाला में शिक्षिका के रूप में  सेवाएं जारी रखते हुए अपने चारों पुत्रों के पालन पोषण एवं उन्हें उत्तम शिक्षा प्रदान करने का विकल्प चुना सादा जीवन उच्च विचार के दृष्टिकोण को अपने जीवन में भी चरितार्थ करने वाली  मां ने नार्मल स्कूल और शासकीय कमला नेहरू गर्ल्स स्कूल में भी शिक्षिका के दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करते हुए  अपनी छात्राओं के लिए अध्यापक और अभिभावक दोनों की ही भूमिका इस प्रकार  निभाई कि उनकी पढ़ाई हुई छात्राएं आज भी उनका  श्रद्धापूर्वक स्मरण करती  हैं। यह भी स्मरणीय है कि शैक्षणिक क्षेत्र के अतिरिक्त ममतामयी माँ की साहित्य सृजन में भी गहरी रुचि थी और उन्होंने   ज्योत्सना पाठक के उपनाम से काफी प्रभावी और पठनीय साहित्य सृजन भी किया। पूज्यनीया अम्मा जी ने 16 फरवरी 2017 को 92 वर्ष की आयु में महाप्रयाण किया। राष्ट्रकवि स्व श्री मैथिली शरण गुप्त की  निम्नलिखित पंक्तियाँ  माँ के प्रेरणा दायी व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर पूरीतरह चरितार्थ होती हैं 
   जितने कष्ट कंटकों  में हे
  जिनका जीवन सुमन खिला
  गौरव गंध उन्हें उतना ही
  यत्र तत्र  सर्वत्र मिला