यह  संभवतः 2006 की बात है। मध्यप्रदेश की जीवनरेखा मानी जाने वाली पुण्य सलिला नर्मदा के पावन तट पर बसे एक छोटे से आदिवासी जिले मंडला का एक युवक कुछ बड़ा करने की चाह में अकेले ही मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल पहुंच गया। उसके पास मां नर्मदा के आशीर्वाद के अतिरिक्त और कोई पूंजी नहीं थी लेकिन वह कलम का धनी था। वह पत्रकार के रूप में अपनी पहचान बनाने के दृढ़ संकल्प के साथ राजधानी आए इस युवक का राजधानी में कोई गाडफादर बनने के लिए तैयार नहीं हुआ। समवयस्क पत्रकार बंधु भी उससे कन्नी काट रहे थे जिसकी सबसे बड़ी वजह थी उस युवक का ज़िद, जज्बा और जुनून  जो उसके हम पेशा लोगों के मन में इस संदेह को जन्म दे रहा था कि बाहर से आया यह युवा पत्रकार एक दिन कहीं उनसे आगे न निकल जाए जबकि राजधानी में नवागंतुक इस युवा पत्रकार के मन में ऐसी कोई बात थी ही नहीं। उसके मन में तो सबके प्रति मैत्री का भाव था। सबके साथ सहयोग करने का स्वभाव था। राजधानी में वह गला काट स्पर्धा में शामिल होने के लिए कतई नहीं आया था। उसके मन में तो पत्रकारिता को मिशन बना कर कलम के सिपाही के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाने की ललक थी लेकिन अपनी अलग पहचान बनाने के लिए किसी की रेखा छोटी करने का विचार उसके में कभी नहीं आया। धुन के पक्के उस युवा पत्रकार ने तो तो ठान लिया था कि उसे पीछे मुड़कर नहीं देखना है। सफलता का यही मंत्र उसे हमेशा आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करता रहा। उसके सफर में ऐसे कई पड़ाव भी आए जहां सत्ताधारियों के भव्य दरबार  की चकाचौंध कलम के सिपाहियों को दरबारी बनने के लिए प्रलोभित कर रही थी परंतु जिसके सिर पर मां नर्मदा का वरद हस्त हो उसे दरबारी बनकर ताली बजाने वालों की भीड़ में शामिल होना कैसे गवारा हो सकता था। उसने कदम कदम पर मिलने वाले सारे प्रलोभनों को ठुकराते हुए अपना सफर जारी रखा। उसने अपनी जिद्द , जुनून और जज्बे को कभी मरने नहीं दिया। उसकी इसी जिद जुनून और जज्बे ने आज  राजधानी के चुनिंदा सुप्रतिष्ठित पत्रकारों की कतार में उसे अलग पहचान प्रदान की है। दो दशक पुराने  उसके प्रतिद्वंद्वी आज उसके विशाल मित्र परिवार का हिस्सा बन चुके हैं। उसके विरोधी  भी उसकी प्रशंसा में संकोच नहीं करते ।  मंडला से शुरू हुआ सफर भले ही आज मध्यप्रदेश की सीमाओं को पार कर देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच चुका है परन्तु आज भी कृष्ण मोहन झा उतने ही विनम्र हैं जितने दो दशक पूर्व थे। यही गुण कृष्ण मोहन झा को कृष्ण मोहन झा बनाता है। यही कृष्ण मोहन झा होने के मायने हैं।

काम के प्रति जुनूनी हद तक समर्पण ने कृष्ण मोहन झा को आज बेहद व्यस्त बना दिया है परन्तु बात अगर किसी की मदद करने की हो तो उनकी यह व्यस्तता कभी आड़े नहीं आती। रामचरितमानस की पंक्ति " परहित सरिस धर्म नहिं भाई " को उन्होंने अपने जीवन में इस तरह उतार लिया है कि किसी की मदद करना हो तो वे अपने नुकसान की परवाह भी नहीं करते। उनके प्रभाव क्षेत्र और परिचय का दायरा इतना बड़ा है कि आप उसकी सीमाओं का अंदाजा नहीं लगा सकते। उनके हाथ में इतना यश है कि नामुमकिन प्रतीत होने वाले काम में भी अगर उनका हाथ लग जाए  उसके पूरा होने में संदेह की किंचित मात्र गुंजाइश भी नहीं रहती। उनके पास आप हर समस्या का समाधान पा सकते हैं। वे चुनौतियों से कभी नहीं घबराते बल्कि आगे बढ़ कर अपनी कर्मठता से हर कठिन चुनौती को परास्त करते हैं और न ई चुनौती करने के लिए कमर कस कर तैयार दिखाई देते हैं।

कृष्ण मोहन झा अद्भुत संगठन ‌क्षमता के धनी हैं। देश में श्रमजीवी पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन इंडियन फेडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं के प्रमुख पदों का बखूबी निर्वहन करते हुए उन्होंने अपनी अद्भुत संगठन क्षमता, विलक्षण सूझबूझ और प्रभावी  कार्यशैली का लोहा मनवाया है।  बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी कृष्ण मोहन झा जिस संस्था से जुड़ जाते हैं,उसकी पहचान बन जाते हैं और फिर उस संस्था की सभी महत्वपूर्ण गतिविधियां कृष्ण मोहन झा के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। श्री कृष्ण मोहन झा को हिंदी पत्रकारिता के साथ ही समाज सेवा, साहित्य , कला ,संस्कृति  के क्षेत्रों में उनके सराहनीय योगदान के लिए अनेक गौरवशाली प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा जा चुका है लेकिन बड़े से बड़ा सम्मान पाकर भी उनके अन्दर कभी अहंकार नहीं जागा। किसी भी सम्मान ने उनकी विनम्रता के आभामंडल की चमक को धूमिल नहीं होने दिया। 

श्री कृष्ण मोहन झा की  लेखनी में जो पैनापन है उसके पीछे किसी को मर्माहत करने की मंशा  नहीं बल्कि उसे सचेत करने का भाव अधिक दिखाई देता है। किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर  सीधे सादे लहजे में बिना लाग-लपेट के अपने मन की बात कह देने में उन्हें महारत हासिल है। वे आलोचना करते हैं लेकिन व्यक्तिगत आक्षेप नहीं करते। वे उनके लेखन में आपको कहीं कहीं व्यंग भी दिखाई दे सकता है लेकिन उसके पीछे किसी को घायल करने की मंशा नहीं होती बल्कि उनका व्यंग उनकी विनोदप्रियता का अहसास कराता है। कृष्ण मोहन झा जितने अच्छे वक्ता हैं उतने ही अच्छे प्रवक्ता भी  हैं। सामाजिक सांस्कृतिक शैक्षणिक और पत्रकारिता विषयक संगोष्ठियों में दिए गए उनके व्याख्यानों में  आप उनके अध्ययन मनन और चिंतन की गहराई की अनुभूति कर सकते हैं। प्रतिष्ठित समाचार चैनलों द्वारा आयोजित की जाने वाली परिचर्चाओं में बहुधा उन्हें विषय विशेषज्ञ के रूप में आमंत्रित किया जाता है जहां उनकी राय अहम साबित होती है।

कृष्ण मोहन झा आज अपने यशस्वी जीवन के 48 वर्ष पूर्ण कर 49 वें वर्ष में प्रवेश किया है।दो दशक पूर्व जब उन्होंने मंडला छोड़कर राजधानी भोपाल को अपनी कर्मभूमि बनाने का फैसला किया था तब उनके पास एक छोटे से आदिवासी गांव में चंद   वर्षों की पत्रकारिता के अनुभव की पूंजी थी । भोपाल में किसी भी अवलंबन के बिना उन्होंने शून्य से अपना सफर शुरू किया था और उनकी एक प्रखर और निर्भीक पत्रकार के रूप में उनकी ख्याति  राजधानी ही नहीं बल्कि मध्यप्रदेश की सीमाओं को पार कर चुकी है। एक सेल्फ मेड पत्रकार की यह सफलता निसंदेह वंदनीय है परन्तु इस सेल्फमेड पत्रकार के अंदर जो प्रतिभा मौजूद है उसे देखते हुए  अभी उनका सर्वश्रेष्ठ सामने आना बाकी है। इसमें भी दो राय नहीं हो सकती कि अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार, पारितोषिक और सम्मानों से विभूषित यह सेल्फमेड पत्रकार इनसे भी बड़े सम्मान का हकदार है।