राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने विगत दिनों देहरादून के निम्बूवाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र गढ़ी कैंट में आयोजित " प्रमुख जन गोष्ठी एवं विविध क्षेत्र समन्वित संवाद कार्यक्रम"में पूर्व सेनाधिकारियों एवं पूर्व सैनिकों के साथ संवाद किया। इस कार्यक्रम में सेना का नेतृत्व कर चुके सेवा निवृत्त 6 जनरल , वाइस एडमिरल, डीजी कास्ट गार्ड , ब्रिगेडियर एवं 50 से अधिक कर्नल रैंक के सेवानिवृत्त सेनाधिकारियों सहित हवलदार एवं कप्तान को रैंक के सैकड़ों पूर्व सैनिकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई । कार्यक्रम के प्रथम सत्र में संघ प्रमुख ने अपना सारगर्भित उद्बोधन दिया एवं द्वितीय  सत्र में उन्होंने सामाजिक एवं राष्ट्रीय महत्व के  समसामयिक विषयों पर केंद्रित प्रश्नों के उत्तर दिए। संघ प्रमुख ने पूर्व सेनाधिकारियों एवं पूर्व सैनिकों का आह्वान किया कि वे संघ  शाखाओं में आकर उसके कार्यों को देखें और अच्छा लगे तो संघ से जुड़ जाएं। इसके अलावा आप अपना काम लेकर आएं और उस काम में संघ की मदद ले सकते हैं। सभी विकल्प खुले हैं।समाज में बदलाव लाने के उद्देश्य से बहुत से गैर राजनीतिक संगठन काम कर रहे हैं। आप उनमें भी जा सकते हैं।  वर्तमान में संघ के ज़ो एक लाख तीस हजार से अधिक सेवा केंद्र चल रहे हैं उनमें भी आप अपना योगदान दे सकते हैं और इसके बाद भी अगर आप कोई अच्छा काम बिना फल की आस लगाए कर रहे हैं तो आप हमें जानते हों या नहीं ,हम आपको संघ का स्वयंसेवक ही मानते हैं। संघ प्रमुख ने कहा कि संघ की अपनी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है । वह देश के लिए काम कर रहा है। संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है ।

समाज का संगठित सामर्थ्य प्रत्येक नागरिक को सुदृढ़ बनाता है इसलिए समाज का नेतृत्व चरित्रवान और अनुशासित होना अनिवार्य है। संघ प्रमुख ने कहा कि संघ किसी बाह्य साधन के बिना खड़ा हुआ और दो बार प्रतिबंध लगने के बाद भी समाज की आत्म शक्ति के बल पर निरंतर आगे बढ़ता रहा। संघ प्रमुख ने अग्निवीर योजना को एक प्रयोग बताते हुए कहा कि अनुभव के आधार पर इसमें सुधार और परिमार्जन की गुंजाइश पर विचार होना चाहिए। संघ प्रमुख ने सोशल मीडिया में वैचारिक कटुता को रोकने के लिए सार्थक संवाद और शास्त्रार्थ  की आवश्यकता प्रतिपादित की । संघ प्रमुख ने भ्रष्टाचार के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा कि भ्रष्टाचार केवल व्यवस्था की नहीं नियत की भी समस्या है। बच्चों में संस्कार, आमदनी में बचत और समाज के लिए वितरण की भावना विकसित करने की प्रवृत्ति को राष्ट्रनिर्माण का वास्तविक आधार है। व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर परोपकार में आनंद खोजने की प्रवृत्ति ही स्वस्थ समाज की पहचान है। समान नागरिक संहिता के संबंध में पूछे गए एक सवाल के जवाब में मोहन भागवत ने  उत्तराखंड के यूजीसी माडल की प्रशंसा करते हुए कहा कि उसी तर्ज पर इसे सारे देश में लागू किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि उत्तराखंड देश का ऐसा पहला राज्य है जहां की सरकार ने पिछले साल जनवरी में यूजीसी लागू करने का फैसला किया था।  उत्तराखंड में इसे लागू करने के पूर्व एक प्रस्ताव तैयार कर उस पर सुझाव आमंत्रित किए गए। लगभग तीन लाख लोगों से मिले सुझावों पर गहन विचार करने के बाद उस प्रस्ताव में जरूरी संशोधनों के बाद उसे लागू करने का फैसला किया गया। देहरादून के बाद संघ प्रमुख ने पंजाब के पठानकोट स्थित किरण आडीटोरियम में  सेवा निवृत्त कमीशंड सैन्य अधिकारियों के साथ संवाद गोष्ठी में राष्ट्रीय और सामाजिक महत्व के मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए। सभागार में ' वंदे मातरम् ' के इतिहास, गरिमा और प्रोटोकॉल तथा भारतीय सेना के तीनों अंगों के परमवीर चक्र से सम्मानित वीर सैनिकों की परिचयात्मक प्रदर्शनी विशेष आकर्षण का केंद्र रही। संघ प्रमुख ने अपने व्याख्यान में संघ  की स्थापना, उद्देश्य और कार्य पद्धति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संघ के कार्य को निकट से देखकर ही उसे समझा जा सकता है। संघ किसी के प्रतिस्पर्धा अथवा प्रचार की भावना से नहीं अपितु राष्ट्रहित को केंद्र में रखकर कार्य करता है। सत्ता अथवा लोकप्रियता अर्जित करना संघ का उद्देश्य नहीं है। संघ प्रमुख ने कहा कि संघ समाज से अलग कोई संगठन नहीं है बल्कि समाज का संगठित रूप है। संघ  हर तरह की आलोचना का स्वागत करता है परन्तु संघ को अच्छी तरह समझने के बाद ही उसकी आलोचना की जानी चाहिए। संघ प्रमुख ने भारतीय सेना को अनेकता में एकता का सशक्त उदाहरण बताते हुए कहा कि समाज जीवन में यही भावना सुदृढ़ होनी चाहिए। संघ प्रमुख ने सेना के समर्पण, निष्ठा और अनुशासन जैसे गुणों को समाज जीवन में भी अपनाए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि अधिकारों के साथ ही कर्तव्य पालन भी राष्ट्र को सशक्त बनाता है।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)