राष्ट्रीय एकता और  सामाजिक समरसता का प्रतीक त्योहार होली
                          -बृजेश कुमार द्विवेदी

भारतीय ज्ञान परंपरा की दृष्टि कहती है कि होली प्रकृति के परिवर्तन का उत्सव है। रंग का उत्सव है। सामाजिक सद्भावना का उत्सव है। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् का उत्सव है। एकता, प्रेम और भाईचारे का उत्सव है। लोकबंधुत्व का उत्सव है। यह पर्णकुटीर से लेकर राजमहलों की अट्ट्लिकाओं को प्रफुल्लित करने का उत्सव है। होली की बात बिना वसंत की चर्चा किए अधूरी रहेगी। वसंत आते ही होली आ गई है। होली अकेले नहीं आई है, अनेकानेक परिवर्तनों के साथ आई है। पेड़ पौधे नए-नए पत्ते धारण कर रहे हैं। नव विकसित हो रहे पल्लव मधुवन की आभा बढ़ा रहे हैं। चारों तरफ फूल खिलने लगे हैं। खेतों में पीले-पीले सरसों के फूल लहराने लगे हैं। पीतगामी सरसों मन को सरसा रही है या यूँ कहूँ तो भाव भूमि को और अधिक उर्वर बना रही है। गेहूँ में आ रहीं बालियाँ बलखा रही हैं जिसे देखकर अन्नदाता भी मगन हैं। खेतों में लगी अलसी बिल्कुल अलसा नहीं रही है। 

आम बौरा रहे हैं। अमराइयाँ अँगड़ाइयाँ ले रही हैं। अतिसौरभ को और सौरभ चाहिए। तितलियों को बस पराग चाहिए। इस ऋतु में कोयल सत्ताधीश लग रही है, जैसे पृथ्वीलोक की अकेली सुर सामज्ञी हो, इसलिए इठला रही है। काकपाली की कुहू-कुहू कानों में मिश्री घोल रही है। विभावरी जाने से पहले ही चिडियाँ चहक रही हैं। अंशुमाली की रश्मियों के गोचर से पहले, पूजित प्रभाएँ ह्दय-निलयों में उजाला कर रही हैं। पुरवाई भी मनमानी कर रही है। पक्षियों का समूह कौन सा गीत गा रहा है ? खग शाखाचर हो रहे हैं। तोता-मैना राग-मल्हार गा रहे हैं। मुड़ेर की गौरैया सिर्फ अपनी सुना रही है। सारंग का मोरपंखी नृत्य मनोहारी लोकनृत्य को फीका कर रहा है। पेड़ों पर गिलहरियों की आवाजाही की तीव्रता नयनाभिराम हो रही है। ऐसे लग रहा है कि त्रेता युग में भगवान राम के सेतु बनाते समय जैसे गिलहरी ने अपना समर्पण और उत्सुकता दिखाई थी, वही इस समय पूरे कुनबे में दिखाई दे रही है। ये किसका प्रभाव है। जिसमें मनुष्य तो मनुष्य पशु पक्षी तक बेचैन हुए जा रहे हैं। यही होली है। पूरे के पूरे उपवन महक रहे हैं। फूलों के नए पल्लवों का ऋतु-चक्र बड़ा मनमोहक हो गया है। वासन्तिक क्षितिज होते ही अब टेसू अपने में नहीं है। पलास सामने आकर दहक रहा है। सेमल के लाल-लाल फूल पूरी बसुधा को अपना बना रहे हैं। मानो पूरी प्रकृति ने नया श्रृंगार कर लिया हो। मंद-मंद वासन्ती बयार चलने लगी है। वसन्त की अगवानी में प्रकृति के अंग-अंग खिल उठे हैं। नीम इस बार दावा कर रही है कि उसकी निबौरी मीठी होगी। नीम की प्रकृति में ऐसा बदलाव किसके प्रभाव में हो रहा है ? ये काम कोई योद्धा ही कर सकता है। इसलिए महाकवि कालिदास ने वसन्त को महायोद्धया कहा है।


होली का त्योहार समरसता का त्योहार है। यह समता का भी त्योहार है। होली जैसे महापर्व को रंग पर्व तक सीमित नहीं किया जा सकता बल्कि यह एकता, प्रेम, भाईचारा, सद्भावना का पर्व है। यह एक ऐसा त्योहार है जो समाज में समरसता को बढ़ावा देता है। ऊँच-नीच की खाई को पाटने का काम करता है। यह पर्व हर जाति-पंथ, सम्प्रदाय के लोगों को आपस में जोड़ने का काम करता है। आपस में समरसता का भाव पैदा करता है। लोकबंधुत्व की भावना को बल देता है। होली पर्व की यात्रा हजारों वर्ष की प्राचीन यात्रा है। होली को पौराणिक कथाओं से पहले नवसंस्येष्टि (नई फसल का यज्ञ) कहा जाता था। वैदिक काल में, यह बसंत ऋतु के आगमन और नई फसल (गेहूं, जौ) के आने पर प्रकृति को धन्यवाद देने का उत्सव था। यजुर्वेद में होलिका दहन को अग्नि अनुष्ठान के रूप में मान्यता है, जो नकारात्मकता को जलाकर शुद्धि और समृद्धि का प्रतीक है।

होली पर्व का सबसे प्रारंभिक उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, जो मौसमी परिवर्तन और उससे मिलने वाली खुशी की बात करता है। ऋतं च सत्यं चाभिद्धत्त तपोऽध्यजायत| ततो रात्रिजायत ततः समुद्रो अर्णवः। ( ऋग्वेद 10.190.1) "ब्रह्मांडीय क्रम (ऋत) और सत्य (सत्य) से, गर्मी (तपस) उत्पन्न हुई। उससे, रात का उदय हुआ  और फिर विशाल ब्रह्मांड महासागर का जन्म हुआ।" यह श्लोक प्राकृतिक चक्रों और परिवर्तनों के महत्व पर प्रकाश डालता है, जिन्हें होली जैसे त्योहारों के माध्यम से मनाया जाता है। यजुर्वेद में होलिका दहन के अनुरूप अग्नि अनुष्ठानों (यज्ञ) के महत्व पर भी प्रकाश डाला गया है। अग्ने नय सुपथा रये अस्मान् | विश्वानि देव व्युनानि विद्वान्| (यजुर्वेद 40.16)  "हे अग्नि, हमें समृद्धि के सही मार्ग पर ले चलो; तुम हमारे मार्ग से सभी बुराईयों को दूर करो।" यह श्लोक अग्नि के अनुष्ठानिक और शुद्धिकरण पहलू पर जोर देता है, जो होलिका दहन में एक केंद्रीय भूमिका निभाता है, और अशुद्धियों और नकारात्मकता के विनाश का प्रतीक है। भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े हुए ग्रंथों में होली त्योहार को नकारात्मकता को जलाकर हृदय को शुद्ध करने का अवसर बताया गया है। मन के सारे राग-द्वेश को समाप्त करने का अवसर माना गया है। संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूपों का विस्तार से वर्णन मिलता है। ऋग्वेद और सामवेद में रंगों और ऋतुओं के विशेष महत्व का वर्णन मिलता है। लेकिन हिंदी साहित्य में होली का विशेष महत्व रहा है। महाकवि सूरदास, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर, केशव, घनानंद, देव आदि कवियों ने होली के विविध रंगों को स्पर्श किया है। हिंदी साहित्य में भक्तिकाल और रीतिकाल में होली के विविध प्रसंगों के रसों से परिपूर्ण है। 

होली देश को एकत्रा के सूत्र में बांधती है। देश के अलग-अलग कोने में इस पर्व को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। हरियाणा में इस त्योहार को धुलंडी, पंजाब में होला मोहल्ला, उत्तराखंड में खासकर कुमाऊं क्षेत्र में होली को बैठकी होली और खड़ी होली के रूप में मनाया जाता है। हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में इसे फाग के नाम से जाना जाता है। पश्चिम बंगाल में होली को डोल जात्रा या बसंत उत्सव कहा जाता है। उड़ीसा में इस त्योहार को डोला पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इसी के साथ बिहार और झारखंड में इसे फाल्गुन महीने के चलते फगुआ नाम से भी जाना जाता है। असम में यह त्यौहार फाकुवा या दौल के नाम से मनाया जाता है। मणिपुर में यह 6 दिन के याओसांग त्योहार के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में होली का उत्सव रंग पंचमी तक चलता है। गोवा में होली को शिग्मो के नाम से जाना जाता है। यह वसंत का सबसे अच्छा पर्व माना जाता है। गुजरात में पहले दिन होलिका दहन होता है, जिसके बाद धुलेटी के रूप में मनाया जाता है। केरल में कोंकणी समुदाय मंजल कुली या उकुली मनाता है। इस तरह ये त्योहार पूरे देश का त्योहार है। सभी जातियों-उपजातियों और सभी समाजों का ये पर्व है।

युग-युगीन होली पर्व समता का त्योहार है। इस दिन निश्चय ही आपस की असमता रूपी असुरता का होली की तरह दाह करना चाहिए। यह पर्व जागरूकता ओर क्रियाशीलता का भी संदेश देता है। अभिनव समाज की रचना के लिए होलिका रूपी विध्वंसकारी शक्तियों, कुरीतियों, मूढ़मान्यताओं, अंधमान्यताओं, कुरीतियों, व्यसनों, कुविचारों, दुर्भावों, द्वेष-पाखण्डों को समूह उल्लास के द्वारा भस्मीभूत करने के सामूहिक संकल्प का पर्व है। वैसे तो जीवन का प्रत्येक क्षण ही होलिकोत्सव का पर्याय है। और मन के मैल दूर करने का पर्व है। ऊँच-नीच, जात-पांत के भेदभाव से मुक्ति का पर्व है। समरसता का पर्व है।यह त्योहार क्षमा, रिश्तों के नवीनीकरण और सामाजिक समरसता को प्रोत्साहित करता है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर जोर देने के अनुरूप है।औपनिवेशिक और स्वतंत्रताोत्तर भारत में  होली एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बनी रही है। यह पर्व आज भी पूरे भारत में और विश्व भर में भारतीय समुदायों में उत्साह के साथ मनाया जाता है और अपनी समृद्ध संस्कृति से लोकबंधुत्व, एकता और समरसता का संदेश देता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)