आदि जगद्गुरु शंकराचार्य भारत की युवा पीढ़ी के लिये सदैव प्रासंगिक है : महामण्डलेश्वर स्वामी अखिलेश्वरानंद गिरि 

आज से लगभग ढ़ाई हजार वर्ष पूर्व दक्षिण भारत की पावन धरा केरल प्रान्त के छोटे से ग्राम "कालड़ि"में पूर्णा नदी के तट पर जन्में आदि जगद्गुरु शंकराचार्य के नाम से विश्व विश्रुत महापुरुष के सिद्धांत व उपदेश आज भी भारत वर्ष में उतने ही प्रेरक व प्रासंगिक हैं,जितने तत्कालीन आर्यावर्त में स्वीकार्य रहे। "आदि शंकर" के अनुसार राष्ट्र निर्माण में एवं पारम्परिक जीवन मूल्यों के संरक्षण में प्रत्येक युग में युवकों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है, तभी तो अनादिकाल से प्रत्येक युग-काल और परिस्थिति में भारतीय अध्यात्म,दर्शन और यहां के जीवन मूल्य सदैव स्वीकार्य,प्रेरक और प्रासंगिक रहे। हम आप यदि ध्यान से मनोयोग पूर्वक आचार्य शंकर के जीवन का अध्ययन और उनके "कृत-कार्यों"का चिंतन करेंगे तो पायेंगे कि-"भारत की धरती सचमुच ही रत्नगर्भा थी,रही है और आज भी है तथा विश्वास पूर्वक हम कह सकते हैं कि- आगे भी रहेगी।" राष्ट्रीय गौरव गरिमा की प्रतीक हमारी इस भारत की पावनी वसुन्धरा ने न केवल भौतिक रत्न ही अपने गर्भ से उत्पन्न किये हैं बल्कि ऐसे-ऐसे प्रतिभाशाली,विलक्षण मेधा सम्पन्न,अध्यात्म-वेत्ताओं,दार्शनिक-चिन्तकों-क्रान्तिदर्शियों,भौतिक व आध्यात्म विज्ञानिकों,तेजस्वी-तपस्वियों को यहां जन्म दिया जिन्होंने अपनी दिव्य आभा-प्रभा और प्रतिभा के आलोक से न केवल आर्यावर्त को ही अपितु सम्पूर्ण "भू-मण्डल"को आलोकित किया,अज्ञान के अंधकार से हटाकर सम्पूर्ण विश्व मानवता को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित किया,तभी तो दुनियां के लोग "भारतीय संस्कृति,अध्यात्म,धर्म, ज्ञान-विज्ञान और यहां के जीवन- दर्शन को जानने-समझने और उसे आत्मसात् करने के लिये प्राचीन काल से अद्यावधि उत्सुक और लालायित हैं;यही कारण है कि- "विश्व के किसी भी देश को *विश्वगुरु या जगद्गुरु होने का गौरवपूर्ण पद प्राप्त नहीं हुआ। भारत वर्ष अतीत में विश्वगुरु था, वर्तमान में विश्व गुरु है और भविष्य में भी विश्वगुरु रहेगा।आज भी सम्पूर्ण विश्व अंधकार में भटकता दिखाई दे रहा है,तब भी आशा का एक दीप आश्वासन दे रहा है कि- विश्व को आतंक से,दैन्य से,भय और त्रासदी से मुक्ति दिलाना है तो भारतीय अध्यात्म दर्शन और चिंतन का "अमर-पाथेय" विश्व के कल्याण -पथ प्रशस्त कर सकने में समर्थ है।"विश्व स्तर पर उपजी समस्यायें  निराशा,भय,भ्रम,आतंक और अनिश्चय की स्थिति कहीं अराजकता में परिवर्तित न हो जाये इसके लिये भारतीय जीवन मूल्योंएवं आध्यात्मिक तत्त्वों की ओर पुनः एक बार सामूहिक रूप से विश्व समुदाय को उन्मुख होना ही पड़ेगा। "आद्य जगद्गुरु शंकराचार्य" जी का"अद्वैत चिंतन "विचार और उनके द्वारा प्रतिपादित आध्यात्मिक सिद्धान्त न केवल भारतीय युवाओं बल्कि विश्व समुदाय के युवकों का समुचित मार्गदर्शन में सहायक सिद्ध होगा;ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है। सबसे पहले आज के मानव (विशेष तौर पर आज के युवाओं को) यह समझना बहुत आवश्यक है कि- मैं कौन हूं?मैं कहां से आया हूं? मुझे कहां जाना है?मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है? प्रारब्ध वश या मेरे प्रयत्न अथवा पुरुषार्थ से मुझे प्राप्त सांसारिक पद-पदार्थों है मेरा क्या सम्बन्ध है?  जन्म,जीवन और मृत्यु क्या है?जीवन जीने के महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त व सूत्र कौन से हैं?जन्म के पूर्व तथा जीवन की स्थिति में एवंमृत्यु के बाद का जीवन कैसा और किस प्रकार है? चींटी से लेकर हाथी पर्यन्त और इनके मध्य अनंत कोटि जीवों उनके जन्म व जीवन का रहस्य क्या है? सभी जीवों का चाहे वह जिस योनि में जन्मा हो,(कितना क्षुद्र"छोटा या "बड़े आकार" का हो)इन सभी का परस्पर क्या सम्बन्ध है?

इसी प्रश्नों का उत्तर आदि शंकर के अद्वैत सिद्धान्त के अमर सूत्र:-
श्लोकार्द्धेन प्रवक्ष्यामि,यदुक्तं ग्रन्थ कोटिभि:।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवों ब्रह्मैव नापर:।।

इस सूत्र वाक्य के भाव बोध को गहराई से समझने में सरलता से मिल जाता है। कोsहं क: संसार: मैं कौन और यह संसार क्या है? इसका भी उत्तर देने में आचार्य शंकर का सिद्धांत समर्थ है। ज्ञाते तत्त्वे क: संसार: अर्थात्  तत्त्व के ज्ञात हो जाने पर यह संसार कहां रह जाता है,इस गुत्थी को भी वे अद्वैत सिद्धान्त के सूत्र से सुलझा देते हैं।आचार्य शंकर ने अपने देश संन्यासी युवा शिष्यों को जो उस समय के श्रेष्ठ आध्यात्मिक जीवन जीने वाले एवं समाज में सांस्कृतिक व सामाजिक चेतना जागरण हेतु समर्पित होकर आचार्य शंकर के निर्देशन में रचनात्मक कार्य करने तत्पर हुये थे, उन्होंने प्रश्नोत्तर के माध्यम से अपने संन्यासी शिष्यों को सम्बोधित किया था,वह उपदेश "प्रश्नोत्तरी मणिरत्नमाला" नामक लघुकाय पुस्तिका के रूप में "गीता प्रेस, गोरखपुर"से प्रकाशित और लगभग सभी बुक स्टालों में उपलब्ध है। "प्रश्नोत्तरी मणिरत्नमाला"उस काल में जितनी महत्त्वपूर्ण रही है आज भी उसके अध्ययन और अर्थानुसंधान के माध्यम से "व्यक्तित्व विकास में" सहायक है।भारतवर्ष के युवाओं को मेरी प्रेरणा है कि-किसी योग्य,अनुभवी एवं आध्यात्मिक साधक,श्रेष्ठ गुरु की शरण में रहकर राष्ट्र -समाज-,भारतीय संस्कृति तथा भारतीय जीवन मूल्यों के विभिन्न पक्षों का गहन चिंतन,अध्ययन अवश्य करना चाहिए। भारतीय युवा एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं से विनम्र परामर्श है कि- जिन्हें समाज जीवन में समर्पित भाव से लम्बे समय तक राष्ट्र निर्माण में योगदान करना हो उनमें आत्म संयम पूर्वक, इन्द्रिय संयम की नितान्त आवश्यकता है। परमपूजनीय आचार्य शंकर अपने युवा संन्यासी शिष्यों के प्रश्नों का उत्तर किस प्रकार से देते हैं देखने योग्य है। प्रश्न- क:शत्रव: सन्ति? उत्तर-निजेन्द्रियाणि। प्रश्न- कानि मित्राणि? उत्तर-तान्येवमित्राणि जितानि यानि। प्रश्न-अहर्निशं किं परिचिंतनीयम्?उत्तर- संसार मिथ्यात्व शिवात्म तत्त्वम्। प्रश्न-शूरान्महाशूरतमोsस्तु को वा?उत्तर-मनोजबार्णैर्व्यथितो न यस्तु, इत्यादि।