मुख्यमन्त्री का औचक निरीक्षण या बड़ा सियासी संदेश?
कृष्णमोहन झा
मध्यप्रदेश की राजनीति में किसान केवल एक वर्ग नहीं, बल्कि सत्ता की दिशा तय करने वाली सबसे बड़ी ताकत रहा है। जिसने किसान के मन को समझा, उसने प्रदेश की राजनीति में स्थायित्व पाया और जिसने किसान की पीड़ा को हल्के में लिया, उसे सत्ता से बाहर का रास्ता भी देखना पड़ा। मध्यप्रदेश का राजनीतिक इतिहास इस सत्य का गवाह है। साल 2017 का मंदसौर किसान आंदोलन आज भी प्रदेश की राजनीति का सबसे संवेदनशील अध्याय माना जाता है। मंदसौर में किसानों के आंदोलन के दौरान हुई गोलीबारी में किसानों की मौत ने पूरे प्रदेश की राजनीति को झकझोर दिया था। उस घटना ने तत्कालीन शिवराज सिंह चौहान सरकार की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उसका असर 2018 विधानसभा चुनाव के परिणामों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। 2018 के चुनाव ने यह संदेश दिया था कि किसान केवल वादों से संतुष्ट नहीं होता। वह अपने सम्मान, अपनी फसल के दाम और सरकारी व्यवहार—तीनों को याद रखता है। यही कारण है कि आज जब गेहूं उपार्जन का बड़ा अभियान चल रहा है, मुख्यमंत्री मोहन यादव का अचानक खरगोन के कतरगांव और शाजापुर के मकोड़ी उपार्जन केंद्र पहुंच जाना सामान्य प्रशासनिक दौरा नहीं माना जाना चाहिए। यह केवल निरीक्षण नहीं था—यह एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश था कि सरकार किसान मुद्दे पर कोई जोखिम लेने के मूड में नहीं है। मुख्यमंत्री ने सही समय पर यह समझ लिया कि खेत में मेहनत करने वाला किसान यदि खरीदी केंद्र पर अपमानित होता है, घंटों लाइन में खड़ा रहता है, बारदाने के लिए भटकता है, तौल मशीन खराब मिलती है या भुगतान के लिए परेशान होता है—तो उसकी नाराजगी धीरे-धीरे राजनीतिक आक्रोश में बदल जाती है।
प्रदेश ने यह पहले देखा है और उसकी कीमत भी चुकाई है
मुख्यमंत्री का अचानक पहुंचना सीधे उस अफसरशाही पर हमला था जो अक्सर भोपाल में बैठकर “सब व्यवस्थित है” की रिपोर्ट भेज देती है, जबकि जमीन पर किसान परेशान खड़ा दिखाई देता है। कतरगांव में मुख्यमंत्री ने किसान सुरेश पाटीदार की 55 क्विंटल गेहूं खरीदी की पूरी प्रक्रिया अपने सामने करवाई और ₹1 लाख 44 हजार 374 की पावती सौंपी। शाजापुर के मकोड़ी में मुख्यमंत्री ट्रैक्टर-ट्रॉली पर चढ़े, किसानों से बात की, तौल व्यवस्था देखी और फीडबैक लिया। यह दृश्य प्रतीकात्मक जरूर था, लेकिन संदेश बेहद स्पष्ट था—मुख्यमंत्री अब फाइलों की बजाय खेत और खरीदी केंद्र की भाषा समझना चाहते हैं।
उन्होंने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए—
दो नहीं, छह तौल कांटे होंगे बारदाने की कमी नहीं होगी नेटवर्क बाधा नहीं होगी किसानों के लिए छाया, पानी और बैठने की व्यवस्था होगी
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या यह सब व्यवस्था पहले नहीं हो सकती थी? क्या किसानों को पानी चाहिए, यह बताने के लिए मुख्यमंत्री को खुद केंद्र पहुंचना पड़ा? क्या प्रशासन इतना सुस्त हो चुका है कि शीर्ष नेतृत्व को हर बुनियादी व्यवस्था खुद देखनी पड़े? यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा और असहज सवाल है। मुख्यमंत्री ने खरीदी अवधि 9 मई से बढ़ाकर 23 मई कर दी और साफ कहा कि जरूरत पड़ी तो इसे और आगे बढ़ाया जाएगा। साथ ही उड़द उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए ₹600 प्रति क्विंटल बोनस की घोषणा भी की। यह किसानों को राहत देने वाला कदम है।
लेकिन राजनीतिक सवाल अभी भी जीवित है—
क्या यह औचक निरीक्षण वास्तव में स्थायी बदलाव लाएगा? या फिर कुछ दिनों की प्रशासनिक सक्रियता के बाद फिर वही ढर्रा लौट आएगा? मध्यप्रदेश की नौकरशाही का पुराना रिकॉर्ड बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है। वीआईपी दौरे के पहले अस्थायी व्यवस्था बनाना और दौरे के बाद फिर पुरानी लापरवाही पर लौट जाना एक स्थापित प्रशासनिक संस्कृति बन चुकी है।अगर इस बार भी यही हुआ तो मुख्यमंत्री की पूरी पहल सिर्फ कैमरे की खबर बनकर रह जाएगी। लेकिन यदि लगातार निगरानी हुई जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हुई…और खरीदी केंद्रों की व्यवस्था वास्तव में सुधरी तो यह कदम बड़ा प्रशासनिक सुधार साबित हो सकता है। यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राज्य को अधिक खरीदी लक्ष्य देने की बात मुख्यमंत्री ने कही। यह महत्वपूर्ण है। लेकिन लक्ष्य बढ़ने का लाभ तभी है जब किसान सम्मानपूर्वक अपनी उपज बेच सके। किसान अब केवल घोषणाओं से प्रभावित नहीं होता।
उसे चाहिए—
समय पर खरीदी समय पर भुगतान और सम्मानपूर्ण व्यवहार अगर इनमें से कोई एक भी चीज टूटती है, तो नाराजगी जमा होती है और राजनीति उसका परिणाम भुगतती है। मंदसौर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने फिलहाल सही समय पर सही संदेश दिया है। अब असली परीक्षा प्रशासन की है। क्योंकि किसान भूलता नहीं और जब किसान नाराज होता है, तो उसका असर केवल मंडियों तक सीमित नहीं रहता—वह सत्ता के गलियारों तक सुनाई देता है।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)